फतेहाबाद. नदियों के पवित्र जल को कलश में प्रतिष्ठित कर 108 कलशों के द्वारा विशाल शोभायात्रा के रूप में श्री गीता मंदिर फतेहाबाद में आज श्री विग्रह प्रतिष्ठा कार्य प्रारंभ हुआ। इस अवसर पर इस पवित्र जल की महिमा बताते हुए डॉ.स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने कहा कि अगर नदियों में प्रदूषण न होता, हवा प्रदूषित न होती तो इतने रोग न होते। भारतीय वैदिक परंपरा में पर्वत, वनस्पति, सरिता आदि को देवता मानकर पूजने का आदेश दिया है। पूजा का अर्थ केवल पुष्प चढ़ाना ही नहीं है, पूजना का मूल भाव है, इन सबके प्रति आदरणीय भाव रखना। अब तो हमारे पढ़े-लिखे तथाकथित धार्मिकजन तीर्थ भूमि में जाकर भी गंदगी और कचरा फैलाकर आ जाते हैं। हमारी सनातन रीति में गृहप्रवेश अथवा नूतन प्रतिष्ठान आरंभ के श्रीगणेश पर सर्वप्रथम सर्व तीर्थमय जल कुंभ को ही प्रवेश कराया जाता है। प्राकृतिक संपदा के प्रदूषित हो जाने पर तीर्थ की शुचिता तथा चेतना अक्षुण्ण कैसे रह सकती है। परमात्मा की पूजा अधूरी है यदि प्रकृति की पूजा न हुई। परमात्मा ने श्री कृष्ण रूप में अवतार लेकर गिरीराज का पूजन करवाया तथा इस माध्यम से यह प्रेरणा दी कि पर्वतों को, वृक्षों को कटने से बचाया जाए, यही सच्ची कृष्ण भक्ति है, परंतु हम लोग इतने चतुर है जो भगवान को तो मानते हैं। मगर भगवान की नहीं मानते। भगवान ने कालिया नाग का वध कर जल प्रदूषण को रोका। इस लीला का यही रहस्य है कि प्राकृतिक संपत्ति पर सभी का समान अधिकार है। इसे अशुद्ध करने वाला समाज का अपराधी है। प्रकृति और ब्रह्म दोनों की पूजा से लोक-परलोक बनेंगे।
No comments:
Post a Comment