Tuesday, February 16, 2010

यज्ञ वैदिक विधान है, विज्ञान है परंपरा नहीं: स्वामी दिव्यानंद जी

फतेहाबाद. वेदों में यज्ञ के रूप में अग्निविद्या एक वैदिक विधान है, जिसमें पांच प्रकार की शुद्धि परमावश्यक है। स्थान शुद्धि, भूत शुद्धि, मंत्र शुद्धि, द्रव्य शुद्धि और भाव शुद्धि। ये शुद्धियां यज्ञ के मूलाधार हैं। इसलिए यज्ञ करनरे वाला साधक हर प्रकार से शुद्ध हो जाता हैं। आज की ज्वलंत समस्या पर्यावरण के प्रदूषण के लिए वैदिक विधि से किया जाने वाला यज्ञ ही समाधान है। श्री गीता मंदिर मॉडल टाउन फतेहाबाद में सद्गुरूदेव श्री प्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित श्रीगीतामहायज्ञ में तपोवन हरिद्वार से पधारे श्री गीताव्यास डॉ.स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने कहा कि आज यज्ञ अग्नि विद्या के रूप में न होकर मात्र परंपरा या रिवाज का रूप लेता जा रहा है। विधान छूटते जा रहे हैं। यज्ञ को वैदिक रूप दिया जाना चाहिए। इसके लिए विद्वानों की परम आवश्यकता है। यज्ञ करने से उत्पन्न फोरमैल्डीहाईड गैस वातवारण को बैक्टीरिया फ्री करती हे, जिससे वातावरण पूर्ण रूपेण सुरक्षित हो सकता है और फिर मंत्रों का विशेष प्रयोग तो पुरोहित और यजमान अर्थात मंत्रो को उच्चारण करने वाले और श्रवण करने वाले दोनों को चुंबकीय ऊर्जा से भर देते हैं। उस वातावरण में आने वाले प्रत्येक जीव अपने क्षुद्र स्वभाव को भूलकर उसी विराट ब्रह्म चेतना से जुड़ जाता है। यह सत्य है कि आज की जो प्रदूषण समस्या है, जिसके लिए विश्व की सरकारें अरबों डॉलर खर्च करके भी समाधान नहीं ढूंढ पा रही हैं, अपने आप को असमर्थ पा रही हैं, वैदिक विधि से होने वाले यज्ञ द्वारा इस समस्या का समाधान हो सकता है। केवल बाह्य प्रदूषण ही नहीं मानव मात्र का एक आंतरिक प्रदूषण भी है और इसी आंतरिक प्रदूषण के कारण ही बाह्य प्रदूषण जन्म लेता है। त्रेतायुग के महाराजा दशरथ की भांति उनके अपनी ओर से कैकेयी को दिए वरदान उन्हें क्या मालूम था कि किसी दिन उन्हीं के लिए श्राप हो जाएंगे। इस दृष्टि से विज्ञान को वरदान कहें या अभिशाप विचारणीय विषय है। इसके लिए संशोधन की आवश्यकता है। कहने वाले तो यह कहते हैं कि आने वाला विश्वयुद्ध किसी बहुत बड़े बुद्धिमान के पागलपन के कारण ही लड़ा जाएगा। इस सारी समस्या का एक ही समाधान है कि भारतीय मनीषियों की अति प्राचीन वैदिक शोध यज्ञ विज्ञान को विधान पूर्वक समाज में प्रतिष्ठित किया जाए।

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