फतेहाबाद. जिस परिवार में सुमति के रूप में माता हो, संतोष के रूप में पिता विराजमान हो, निर्भयता, प्रसन्नता, अचाह, असंगता और मीठी वाणी के अन्य सदस्य हों। तब समझ लेना चाहिए कि वह परिवार हर प्रकार से साधन संपन्न परिवार होगा। श्री गीता मंदिर मॉडल टाउन फतेहाबाद में श्री प्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य पर व्यक्ति के पारिवारिक धर्म की चर्चा करते हुए तपोवन हरिद्वार से पधारे डॉ.स्वामी दिव्यानंद जी महाराज ने कहा कि खाली माता पिता न हो तो परिवार अनाथ नहीं हो जाता, अपितु मति मारी जाए तो निश्चित समझें कि परिवार अनाथ हो जाता है। श्री गुरु नानक देव जी महाराज साहेब जब तीसरी उदासी में प्रवेश कर रहे थे तो माता तृप्ता जी ने उनको रोका कि यदि तुम चले जाओगे तो पीछे परिवार का क्या होगा। साहब श्री बोले कि हे माता! मेरा परिवार तो मेरे साथ ही है। तो मां ने पूछ ही लिया कि जब मैं तेरी माता तेरे साथ नहीं, तेरे पिता जी यहीं हैं मित्र कुटुम्बी भी सब यहीं है तो तेरे साथ कैसे? साहब जी बोले, हां माता जी, उसमें माता-पिता कुटुंब परिवार सब हैं। मां को आश्चर्य हुआ और बड़ा अजीब सा भी लग गया कि नानक कैसी-कैसी बातें कर रहा है? मैंं यहां तलवंडी में रह रही हूं। तेरे साथ कब गई हूं? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम शरीर करके मेरे साथ नहीं होते, किंतु तुम्हें मेरी याद आती है। और इस दृष्टि से मेरी याद के रूप में तुम मुझे साथ रखते हो और कह रहे हो कि मेरी माता मेरे साथ रहती है। साहब जी बोले, नहीं, मां मैं ऐसा भी नहीं कहना चाहता, पर आपको मेरी बात समझ में नहीें आ रही। तभी तो आचार्यों का मानना है कि संतों से छह प्रकार के लोग उनकी तत्वनिष्ठा का, उनके उपदेश का लाभ नहीं ले पाते। माता-पिता, भाई बहन अथवा परिवार वाले, अति समीपी मित्र, द्वेष रखने वाले, अहंकार से भरे कुतर्की, मंद बुदिध से युक्त और पूर्वाग्रही। इनमें कुछ की तो समझ ही नहीं आ पाती, किंतु कुछ समझने को राजी ही नहीं होते। रिश्तेदारों में माता-पिता में ममता का पूर्वाग्रह होता है। माता तृप्ता जी भी वात्सल्य से भरी पट्टी अपनी आंखों पर रखकर नानक को देख रही है और साथ-साथ उनकी बातेें सुन रही हैं। पूछती हैं, पुत्र नानक से कि क्या तेरे उस पविार में मां भी है क्या? हां है! साहब श्री बोले क्या नाम है, उस माता का, जो तेरे साथ जाती है। तब साहब श्री गुरुनानक देव जी महाराज ने परिवार के रूप में अंदर के उन दिव्य गुणों को बताया, जो धर्म का, भक्ति और ज्ञान का तथा सद्गुणों का वास्तविक स्वरूप है। जिस परिवार के बिना यह बाहर का परिवार बाहर का संसार भी मात्र एक धोखा ही है, साहिब श्री नानक जी बोले हे माता जी। माता मत पिता संतोख, सत भाई कर इह विशेख।। सुबुद्धि अर्थात अच्छी बुद्धि ही मेरी माता है, जो कदम कदम पर मेरी रक्षा करती है। जिसकी मां मर जाए, उसे हम यतीम कहते हैं। पर गुरु नानकदेव जी का मानना है कि उसे यतीम मत कहो, जिसकी मां मर जाए, अपितु जिसकी मति मारी जाए, अथवा बुद्धि भ्रष्ट हो जाए, उसे अनाथ ही समझना। बिना माता-पिता के भी सुबुद्धि युक्त पुरुष सुखी जीवन जी सकता है, किंतु दुर्योधन और दुशासन जैसे दुर्बुद्धि युक्त व्यक्ति माता गांधारी के होते हुए भी सर्वनाश को प्राप्त हुए। महाभारत जैसे विनाशकारी युद्ध के मूल कारणों में से एक कारण बना बुद्धिहीनता अथवा दुर्बुद्धि।
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