फतेहाबाद. श्री रघुनाथ मंदिर के वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन प्रवचन करते हुए हरिद्वार से पधारे महामंडलेश्वर डा. स्वामी दिव्यानन्द जी महाराज ने कहा कि भारत वर्ष ऋषि संस्कृति और कृषि संस्कृति प्रधान देश है। यदि ऋषि प्रधन और कृषि क्षेत्र में हम भारत वासी पिछड़ते गए तो भारत जैसे देश में उन्नति संभव नहीं है। ऋषि संस्कृति कर्म प्रधान है। प्रभु कृपा का आश्रय लेते हुए हम अपने कर्म को शुद्ध करें। व्यवहारिक कुशलता के साथ कार्य करें तो फल निश्चित रूप में प्राप्त होगा। यहां कृषि कर्म को भी पूजा रूप में ही देखा गया है। वन, पर्वत, मेघ, वर्षा, वृक्ष आदि को भी देवता के यप में ही स्वीकार कर इनको पूजा गया है। क्योंकि बिना किसी स्वार्थ के ये मानव जाति को देते ही देते हैं। यह प्राकृतिक सम्पदा यदि सुरक्षित है तो देश सुरक्षित है। महाराज श्री जी ने कहा कि श्री गिरिराज धरण लीला में परमात्मा श्री कृष्ण कर्म को महत्व देते हुए बृजवासियों को इस प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित रखने की प्रेरणा दे रहे हैं। यह गिरिराज कुछ और नहीं अपितु त्रेतायुग में लंका विजय के लिए प्रभु श्रीराम द्वारा सेतु बन्धन के लिए द्रोण गिरि पर्वत पर से लाया गया पर्वत है। मर्यादा के स्वरूप श्री सीता जी अर्थात् मर्यादा की पुन: प्रतिष्ठा करने के लिए श्रीराम द्वारा सेतुबन्ध की स्थापना हुई। श्रीराम जी की आज्ञा प्राप्त कर हनुमान जी द्रोण गिरि पर्वत पर गए। पूछने पर बताया कि राम कार्य के लिए यदि अपना घर भी छोडऩा पड़े, मर्यादा की पुन: प्रतिष्ठा के लिए यदि हमें घर से उजडऩा भी पड़े तो वह उजडऩा नहीं अपितु बसना है। राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए यदि प्राण भी छूटते हैं तो वह मरना नहीं अपितु अमर हो जाना है। शहीद मर कर भी नहीं मरता। इसी शर्त पर द्रोण गिरि पुत्र वह पर्वत हनुमान जी उठाकर चले। बृज मंडल के ऊपर से निकल ही रहे थे कि सूचना मिल गई कि प्रभु श्रीराम को और पत्थर नहीं चाहिए। सेतु बन्धन का कार्य सम्पन्न हो गया है। यदि अब कोई और पत्थर लगाएगा तो रामाज्ञा का उल्लंघन माना जाएगा और सामाजिक रूप में अतिक्रमण माना जाएगा। राज राज्य में अधिकारों का अतिक्रमण नहीं होता। हनुमान जी ने इस पर्वत राज को वहीं प्रतिष्ठित कर दिया। राम आज्ञा हुई कि द्वापर युग में इन पर्वत राज की सेवाएं ली जाएंगी। आज यही पर्वतराज भगवान के स्वरूप में ही श्रीगिरिराज के स्वरूप में पूजित हो रहे हैं। श्रीकृष्ण ने कहते हैं कि हे मां, यदि व्यक्ति अपने चित को शुद्ध कर सदाचार से युक्त होकर प्रभुनाम स्मरण करता हुआ अपने लौकिक कर्म शास्त्र मर्यादानुसार करता है तो वह वास्तव में देवाराधन कर रहा है और यदि नाना प्रकार के आडम्बर दिखावाकर के कपट पूर्वक व्यवहार कर मात्र रूढिय़ों और परम्पराओं में भी लिपटा पड़ा है तो उसके द्वारा की गई वह पूजा भी दम्भ है। इसलिए नाम स्मरण द्वारा अन्तकरण पवित्र करें और प्रकृति को प्रदूषण से मुक्त कर वातावरण को पवित्र करें तो एक सुंदर स्वस्थ समाज की स्थापना हो सकेगी। केवल द्रव्य प्रधान होकर भय से ग्रस्त होकर सड़ी गली रूढिय़ों से अपने आप को उलझाकर धार्मिक मान लेना अज्ञानता ही कही जाएगी। श्रीकृष्ण ने इंद्र पूजा छुड़वाकर पर्वतराज की पूजा करवाई। गायों की पूजा करवाई ताकि प्रकृति में संतुलन बना रहेगा तो व्यक्ति भी सुखी रहेगा। आज भारत को श्रीकृष्ण जैसे क्रांतिकारी युवा की आवश्यकता है, जो रूढिय़ों और सड़ी-गली परम्पराओं के विरोध में आवाज उठा सकें। प्रबुद्ध समाज को आगे आना चाहिए। दूरदर्शन में मीडिया के माध्यम से ऐसे-ऐसे सीरियल आ रहे हैं, जिससे आज का समाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। आवश्यकता है समाज को यर्थार्थ की। इस अवसर पर मंदिर सभा के प्रधान टेकचंद मिढा, कोषाध्यक्ष ओमप्रकाश सरदाना, बृजभूषण मिढा, सुनील आहूजा एडवोकेट, पवन नागपाल, मोहन लाल नारंग, बनवारी लाल नारंग, इंद्र नागपाल, तरूण बजाज (किट्टू), मोहन तनेजा, नरेन्द्र चानना सहित अनेक गणमान्य लोग एवं महिला श्रद्धालु मौजूद थे।
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