अजय मेहता
फतेहाबाद. लगता है कि सोना अब उन लोगों के लिए 'आधी रात का गहनाÓ नहीं बन पाएगा, जो इसे केवल इसलिए खरीदते थे कि मुसीबत के वक्त इसे बेचकर वे अपनी आर्थिक समस्या का समाधान कर लेंगे। सोने के दामों में आए भारी उछाल और पिछले पांच साल में हुई लगभग तीन गुणा वृद्धि ने उन लोगों के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दीड्ड है जिन्हें अपने लड़के-लड़कियों की शादी करनी है। यही कारण है कि शादी में दिए जाने वाले गहने की मात्रा में भारी कटौती करनी पड़ रही है। हमारे समाज में आम आदमी के लेन-देन की प्रक्रिया काफी हद तक जेवरातों पर ही टिकी रही है। जब किसी आम आदमी पर आर्थिक मुसीबत आन पड़ती थी तो कोई रास्ता न सूझने पर उसे घर में बनवाकर रखे गए गहने उसकी उम्मीद को जिंदा कर देते थे। शायद इसीलिए आम आदमी किसी तरह एक-एक पैसा जोड़कर गहनों को इसलिए तवज्जो देता था कि मुसीबत के वक्त काम आ जाएं। यही कारण है कि सोने-चांदी के जेवरात को 'आधी रात का गहनाÓ भी का गया। परंतु जिस दौर में खाने-पीने की चीजों के दामों में ही 'आगÓ लगी है और अपने पेट की 'आगÓ बुझाना मुश्किल हो रहा है तो 'पीली धातुÓ के दाम सुनकर ही आम आदमी गश खाने लगता है। सोने के दाम 18 हजार रुपए प्रति तोला (प्रति 10 ग्राम) पहुंच चुके हैं जो अब तक का सर्वाधिक मूल्य है। ऐसे में आम आदमी के लिए सोने के जेवरात बनवाने की सोचना भी दिन में सपने लेने के समान हो गया है।
सोना केवल ब्याह-शादियों में दिए जाने वाले शगुन के तौर पर ही नहीं बल्कि आम आदमी इसे एक तरह से निवेश के तौर पर भी इस्तेमाल करता रहा है। अगर दो पैसे जोड़ लिए तो उनसे सोना खरीदकर रख लिया जाता है ताकि बाद में अच्छे दाम मिलने पर बेचा जा सके। हालांकि सोने के दामों में आया भारी उछाल उन उनके लिए लकी साबित हो रहा है, जिन्होंने पिछले पांच साल के दौरान सोने की खरीद की थी, परंतु निवेशक के तौर पर अब मध्यम या गरीब तबके के लोगों से सोना खरीदना पहुंच से दूर हो गया है।
'गरीबी का मारा आम आदमी गंभीर चिंता में है। उसका कहना है कि महंगाई के कारण मजदूरी से घर खर्च चल नहीं पा रहा है तो दूसरी तरफ बेटी के ब्याह की चिंता उसे अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रही है। कारण साफ है- अगर बेटी को एक-दो तोला सोने का जेवरात नहीं चढ़ाया तो समाज में उसकी 'इज्जतÓ नहीं रहेगी, वहीं ससुराल में की दहलीज पर बेटी 'फक्रÓ से कदम नहीं रख पाएगी। पर सोने के दाम तो आसमान छू गए है 'पीली धातुÓ के बिना बेटी के हाथ 'पीलेÓ कैसे होंगे? इसका समाधान फिलहाल उसके पास नहीं है।Ó वहीं खेतीहर मजदूर रतन सिंह बताता है कि उसने तीन एकड़ जमीन में एक चौथाई पर फसल काश्त की थी। जिससे उसके हिस्से में 12 हजार रुपए आए। उसकी पत्नी का विचार था कि इस पैसे से कोई जेवरात बनवाकर रख लेंगे, परंतु रतन सिंह बाजार में सोने का भाव पता करने गया तो दबे पांव घर लौट आया। अब सोना खरीदना उसके वश की बात नहीं है। रतन सिंह जैसे मेहनतकश लोग एक-एक पैसा जोड़कर सोने का जेवरात इसलिए बनवाकर रख लेते हैं कि मुसीबत के समय यह काम आ सके, परंतु अब मुसीबत का समाधान ही मुसीबत बन गया है!Ó
फतेहाबाद. लगता है कि सोना अब उन लोगों के लिए 'आधी रात का गहनाÓ नहीं बन पाएगा, जो इसे केवल इसलिए खरीदते थे कि मुसीबत के वक्त इसे बेचकर वे अपनी आर्थिक समस्या का समाधान कर लेंगे। सोने के दामों में आए भारी उछाल और पिछले पांच साल में हुई लगभग तीन गुणा वृद्धि ने उन लोगों के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दीड्ड है जिन्हें अपने लड़के-लड़कियों की शादी करनी है। यही कारण है कि शादी में दिए जाने वाले गहने की मात्रा में भारी कटौती करनी पड़ रही है। हमारे समाज में आम आदमी के लेन-देन की प्रक्रिया काफी हद तक जेवरातों पर ही टिकी रही है। जब किसी आम आदमी पर आर्थिक मुसीबत आन पड़ती थी तो कोई रास्ता न सूझने पर उसे घर में बनवाकर रखे गए गहने उसकी उम्मीद को जिंदा कर देते थे। शायद इसीलिए आम आदमी किसी तरह एक-एक पैसा जोड़कर गहनों को इसलिए तवज्जो देता था कि मुसीबत के वक्त काम आ जाएं। यही कारण है कि सोने-चांदी के जेवरात को 'आधी रात का गहनाÓ भी का गया। परंतु जिस दौर में खाने-पीने की चीजों के दामों में ही 'आगÓ लगी है और अपने पेट की 'आगÓ बुझाना मुश्किल हो रहा है तो 'पीली धातुÓ के दाम सुनकर ही आम आदमी गश खाने लगता है। सोने के दाम 18 हजार रुपए प्रति तोला (प्रति 10 ग्राम) पहुंच चुके हैं जो अब तक का सर्वाधिक मूल्य है। ऐसे में आम आदमी के लिए सोने के जेवरात बनवाने की सोचना भी दिन में सपने लेने के समान हो गया है।
सोना केवल ब्याह-शादियों में दिए जाने वाले शगुन के तौर पर ही नहीं बल्कि आम आदमी इसे एक तरह से निवेश के तौर पर भी इस्तेमाल करता रहा है। अगर दो पैसे जोड़ लिए तो उनसे सोना खरीदकर रख लिया जाता है ताकि बाद में अच्छे दाम मिलने पर बेचा जा सके। हालांकि सोने के दामों में आया भारी उछाल उन उनके लिए लकी साबित हो रहा है, जिन्होंने पिछले पांच साल के दौरान सोने की खरीद की थी, परंतु निवेशक के तौर पर अब मध्यम या गरीब तबके के लोगों से सोना खरीदना पहुंच से दूर हो गया है।
'गरीबी का मारा आम आदमी गंभीर चिंता में है। उसका कहना है कि महंगाई के कारण मजदूरी से घर खर्च चल नहीं पा रहा है तो दूसरी तरफ बेटी के ब्याह की चिंता उसे अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रही है। कारण साफ है- अगर बेटी को एक-दो तोला सोने का जेवरात नहीं चढ़ाया तो समाज में उसकी 'इज्जतÓ नहीं रहेगी, वहीं ससुराल में की दहलीज पर बेटी 'फक्रÓ से कदम नहीं रख पाएगी। पर सोने के दाम तो आसमान छू गए है 'पीली धातुÓ के बिना बेटी के हाथ 'पीलेÓ कैसे होंगे? इसका समाधान फिलहाल उसके पास नहीं है।Ó वहीं खेतीहर मजदूर रतन सिंह बताता है कि उसने तीन एकड़ जमीन में एक चौथाई पर फसल काश्त की थी। जिससे उसके हिस्से में 12 हजार रुपए आए। उसकी पत्नी का विचार था कि इस पैसे से कोई जेवरात बनवाकर रख लेंगे, परंतु रतन सिंह बाजार में सोने का भाव पता करने गया तो दबे पांव घर लौट आया। अब सोना खरीदना उसके वश की बात नहीं है। रतन सिंह जैसे मेहनतकश लोग एक-एक पैसा जोड़कर सोने का जेवरात इसलिए बनवाकर रख लेते हैं कि मुसीबत के समय यह काम आ सके, परंतु अब मुसीबत का समाधान ही मुसीबत बन गया है!Ó
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