Tuesday, December 1, 2009

केवल मनोरंजर दृष्टि से भागवत श्रवण अपराध है : स्वामी दिव्यानंद

फतेहाबाद. भागवत कथा केवल धार्मिक परम्परा ही नहीं अपितु जीवन जीने की कला है, भवरोग की औषधि है। इसे केवल गा-बजाकर मनोरंजन ही नहीं करना चाहिए अपितु औषधि की तरह सेवन करना है। मन-बुद्धि को स्वस्थ करना है। श्री रघुनाथ मंदिर फतेहाबाद में आयोजित भागवत प्रवचन में तपोवन हरिद्वार से पधारे महामंडलेश्वर डा. स्वामी दिव्यानन्द जी महाराज ने भागवत महिमा बताते हुए कहा कि यह कोई सामान्य पोथी नहीं अपितु भगवान श्री कृष्ण जी का साक्षात् वाङ्गमय स्वरूप है। इसका श्रोता तो एक अच्छी साधक की भांति जपी-तपी और रसिक होना चाहिए। इसे मनोरंजन का साधन मानना अथवा केवल पुण्य लाभ लेने उद्देश्य से सुनना तो अपराध है। श्री महाराज की अध्यक्षता में आज श्री रघुनाथ मंदिर का 55वां वार्षिक महोत्सव शुरू किया गया। इससे पूर्व मंदिर से एक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें सैंकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा में मंदिर सभा के प्रधान टेकचंद मिढ की अगुवाई में अनेकों महिलाओं ने अपने सिर पर कलश रखकर भजन गाते हुए मंदिर की परिक्रमा की। कलश यात्रा के
उपरांत महाराज श्री जी ने हनुमान चालीसा के पाठ के साथ ध्वजारोहण कर वार्षिकोत्सव का आगाज किया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने ध्वजा की परिक्रमा की। समारोह में डा. आशीष नागर जी (उज्जैन), श्री राजेन्द्र पराशर ने अपने भजनों से सद्गुरू देव जी की आराधना की। श्रद्धालुओं को भागवत जी की महिमा बताते हुए श्री महाराज जी ने कहा कि केवल अधार्मिक व्यक्ति ही अपराध नहीं करता, धर्म के नाम पर भी धार्मिक व्यक्ति भी चौसठ प्रकार के अपराध कर डालता है। यत्र तत्र धर्म स्थानों पर उपद्रव खड़े करना, राजनैतिक खेल खेलना, तीर्थों में अपवित्रता अथवा पवित्र नदियों को प्रदूषित करना। मंदिरों में मूर्ति प्रतिष्ठा तक तो बहुत जोश रहता है किंतु बाद में जिन मर्यादाओं का और पवित्रता आदि का ध्यान रखना चाहिए, उन बातों पर ध्यान न रखना ये सब धर्म के नाम पर होने वाले अपराध ही है, जिन्हें आर्ष ग्रंथों में धर्मापराध कहा गया है।
स्वामी जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत तो भागवत भक्तों के भाव का सरलीकरण है, श्रीमद्भागवत तो वह ब्रह्म विद्या है, जो अज्ञान का समूल नाशकारी है। धुन्धकारी इसका प्रमाण है। जब उसकी सद्गति किसी भी श्राद्ध आदि कर्म प्रक्रिया से नहीं हुई, तब भगवान भास्कर की प्रेरणा से गोकर्ण जी द्वारा उसे श्रीमद्भागवत श्रवण कराई गई। प्रतिदिन की कथा में वासना के बांस में बैठे धुन्धकारी की वासना की क्रमश: सात ग्रंथियों में से एक-एक टूटती गई और वह दिव्य स्वरूप में मोक्ष का अधिकारी हो गया। दिव्य विमान लेकर पार्षद उपस्थित हुए धुन्धकारी को लेने। किन्तु गोकर्ण के द्वारा प्रश्र हुआ कि भागवत कथा तो हजारों-हजारों ने सुनी है, तब फिर विमान एक क्यों आया, तब पार्षदों ने उत्तर दिया कि जब तक भागवत कथा श्रवण करने के पश्चात् अज्ञान निवृत न हो, मोक्ष संभव नहीं। मोक्ष का अर्थ है अज्ञान, अविद्या से छूट जाना, मुक्त हो जाना। श्री भागवत कथा कैवल्यपद तभी प्राप्त करा सकती है, जब हमारा अज्ञान टूटे, भ्रम टूटे। इसीलिए केवल ग्रंथों से ही नहीं अपितु सद्गुरू शरण में बैठकर अपना विक्षेप ओर आवरण तोडऩा उद्देश्य है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही भागवत कथा का परम लाभ लेना चाहिए।
इस अवसर पर मंदिर सभा के प्रधान टेकचंद मिढा, कोषाध्यक्ष ओमप्रकाश सरदाना, बृजभूषण मिढा, श्री बनवारी लाल जी जाजोदिया (उज्जैन), सुनील आहूजा एडवोकेट, पवन नागपाल, मोहन लाल नारंग, बनवारी लाल नारंग, इंद्र नागपाल, शगन लाल नागपाल, तरूण बजाज (किट्टू), मोहन तनेजा, नरेन्द्र चानना, लेखराज नागपाल, दीवान चंद नागपाल, अनिल सरदाना, दीपू टुटेजा, वीरभान मैहता, सुभाष सरदाना, भगत गंगाधर निझारा, मा. हरिन्द्र सिंह, स्वामी दित्ता मैहता, योगाचार्य विजय सिंह, शीतल प्रसाद, भगत गुरदियाल, रवि चौधरी, शिव नारायण बतरा, बी.डी. बतरा, वजीरचंद बजाज, बलजीत मदान, मोहन लाल बतरा, दुनीचंद, सुदर्शन मैहता, पुजारी राकेश शर्मा, सुरेश शर्मा व कृष्ण शर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग एवं महिला श्रद्धालु मौजूद थे। इससे पूर्व सोमवार रात्रि को भजन संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें गायक प्रिंस छाबड़ा (लुधियाना) ने राधा-कृष्ण नाम की धुन लगाकर श्रद्धालुओं को भक्तिरस में डुबो दिया।

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