Monday, November 30, 2009

विश्वास और अनुरोग से भरा नाम संकीर्तन सकारात्मक ऊर्जा देता है : डॉ. स्वामी दिव्यानंद

फतेहाबाद. प्रभु नाम स्मरण से यदि हृदय भाव से भर जाए और रसिक के कर्म शुद्ध होने लग जाएं तो समझो संकीर्तन की सार्थकता है। क्योंकि भाव शुद्धि और कर्म शुद्धि ही समस्त साधना का व्यवहारिक फल है। मुख में राम बगल में छुरियां ऐसा दिखावा केवल समाज के साथ ही नहीं अपितु स्वयं के साथ भी बहुत बड़ा धोखा ही है। नाम स्मरण और कथा श्रवण तो ऐसा साधन है, जिसकी तुलना बड़े-बड़े अश्वमेघादिक यशों से भी नहीं की जा सकती। श्रीमद्भागवत में ऐसा वर्णन आता है कि राजा प्रथु जी ने सौ अश्व मेघ यज्ञ करने का संकल्प लिया था, ङ्क्षकतु 99वें यज्ञ पूर्ण होते ही देवराज इंद्र का सिंहासन डोलने लग गया, क्योंकि 100 यज्ञ पूर्ण होते ही यज्ञ करने वाला क्रतु हो जाता है, इंद्र पद को प्राप्त कर लेता है। यह बात इंद्र को कैसे सहन हो सकती है? इसलिए इंद्र ने राजा प्रथु का यज्ञ का घोड़ा ही चुरा लिया। राजा प्रथु को जैसे ही पता चला तो वे निराश नहीं हुए और न ही कोई प्रतिशोध की भावना उठी, अपितु यह सोच लिया कि यदि ऐसा ही है तो मुझे 100वां यज्ञ ही नहीं करना। ऐसा संकल्प उठते ही भगवान नारायण प्रकट हो गए और बोले राजन, वरदान मांंगो। क्या स्वर्ग का राजा बना दूं अथवा वैकुंठ का समस्त वैभव तुम्हें प्रदान कर डालू या फिर समस्त भूमंडल का एकछत्र राजा ही बना दूं। राजा प्रथु बोले मुझे ऐसा कुछ भी नहीं चाहिए। हे नारायण! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो केवल एक ही कृपा करो, संतों के मुखारविंद से जो आपकी पावनी कथा प्रवाहित होती है और रसिकों के द्वारा जो आपका नाम संकीर्तन होता है, उसे श्रवण करने के लिए मेरा एक एक रोम कान हो जाए, अर्थात मेरे इन कानों में ऐसी अनंत गुणा शक्ति आ जाए कि कथा श्रवण करते-करते और नामरस स्मरण करते- करते, मेरा हृदय आपके चरण कमलों का रस पान करते-करते आप में ही अनुरक्त हो जाएं।
न कामये नाथ तदप्यहं वचचिन्न, यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासव:। महत्तमांतहृदयान्मुखच्चुतो विद्यतच कर्णायुत मेष में वर:।।
राजा प्रथु कहते हैं कि हे नारायण! मैं तो आपकी भक्ति का सार ग्राही हूं। वस्तुत: यही यथार्थ है कि जीवन में यदि रस है तो जीवन है अन्यथा जीवन नहीं, वह जीवन तो चलती फिरती लाश ही है। नीरस जीवन भी क्या कोई जीवन होता है? जिसमें प्रति पल व्यक्ति यही सोचत रह जाए कि कब मौत और कब मेरा इन सांसारिक दुखों से पीछे छूटे? किसी शायर ने ऐसे लोगों के लिए स्पष्ट कर दिया है कि
अभी तो सोचते हैं मर जाएंगे, किंतु मर कर भी चैन न मिला। तो फिर किधर जाएंगे।।
दुखों से छूटने का उपाय आत्म हत्या नहीं, आत्मग्लानि भी नहीं अपितु आत्मज्ञान है, प्रभु नाम है। विश्वास पूर्व और अनुराग से भरा नाम स्मरण मन बुद्धि को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर जीवन को संतुलित बनाए रखता है और जीवन का यही संतुलन हृदय को रस से भर देता है। केवल आर्केस्ट्रा और राग स्वर नहीं चाहिए, प्रभु चरणों में अनुराग भी चाहिए। इसीलिए प्रत्येक मानव को जीवन को संतुलित रखने के लिए केवल औषधि ही नहीं प्रभु नाम स्मरण भी करना चाहिए।

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