अजय मेहता
फतेहाबाद, हरियाणा की राजनीति में उलटफेर का दम भरने वाला हजकां-बसपा का गठबंधन महज 75 दिन में ही बिखर गया। लखनऊ से मायावती का फोन रिसीव ना करना इस गठबंधन के बिखरने की आखिरी वजह माना जा रहा है। रोहतक में जब बपसा के मानसिंह मन्हेड़ा ने गठबंधन तोड़ने का ऐलान किया तो फतेहाबाद में गठबंधन के बैनर तले जमा हुई भीड़ कुछेक मिनटों में ही छंट गई। उतरे चेहरे, डगमगाए पैर और सूखे हलक से बोल पाने में बेबस दोनों पार्टियों के लीडर खामोशी ओढ़े घरों को निकल पड़े। हालांकि, अचानक 'रिश्ताÓ टूटने के गम में लीडर ज्यादा कुछ तो नहीं समझ पाए लेकिन थोड़ी ही देर बाद ही चली नए गठबंधनों की अटकलों ने दोनों ही पार्टियों के नेताओं को कुछ राहत दी। सूत्र बताते हैं कि दोनों ही पार्टियों के नेताओं को एक-दूसरे पर शक था। इसी कड़ी में हजकां नेता मानते हैं कि कुछ दिन पहले बसपा का हरियाणा का आला नेता मुख्यमंत्री हुड्डा के निवास पर देखा गया और हिसार में मन्हेड़ा हो थप्पड़ मारने का 'ड्रामाÓ भी प्रायोजित था। जाहिर है, गठबंधन तोड़ने के लिए वजहें कैसे पैदा की जाएं, इस पर मगजबाजी कई दिनों से चल रही थी। आज रोहतक में बसपा के प्रदेश महासचिव मानसिंह मन्हेड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि कुलदीप बिश्रोई गठबंधन होने के बाद से किसी भी कार्यक्रम में शरीक नहीं हो रहे थे और ना ही हजकां के अन्य नेता व कार्यकर्ता गठबंधन धर्म के प्रति गंभीर थे। मन्हेड़ा ने कहा कि कुलदीप बसपा पर गठबंधन में भाजपा को भी शामिल करने पर दबाव बना रहे थे, उनके जिद्दी रवैये के चलते ही पार्टी हाइकमान मायावती ने गठबंधन समाप्त करने का फैसला किया है। वहीं, दूसरी ओर हजकां के तरफ से आधिकारिक ब्यान में कहा गया कि मन्हेड़ा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मिले हुए थे और जब हजकां-बसपा गठबंधन की टिकटों का बंटवारा हुआ, तब भी मन्हेड़ा ने गड़बड़ की थी। अब माना जा रहा है कि इनेलो को अलविदा कहने वाले भाजपा, कुलदीप बिश्रोई से हाथ मिला सकती है और हजकां पर वादाखिलाफी के आरोप जड़ कर नाता तोड़ने वाली बसपा इनेलो से गलबहियां डाल सकती है। चूंकि, हालात ऐसे हैं कि इनेलो, भाजपा, हजकां और बसपा, इन चारों की पार्टियों की आज की तारीख में हालत ऐसी नहीं है कि वे अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ सकें। ऐसे में, एक-दूसरे से हाथ छिटक कर दूसरे का हाथ थामना सभी की मजबूरी है। लोकसभा चुनाव से पहले हुए इनेलो-भाजपा गठबंधन जिस तरह से चुनाव के बाद वादाखिलाफी के आरोप लगा कर भाजपा ने तोड़ा, ठीक उसी तरह विधानसभा चुनाव से ऐन पहले हजकां-बसपा गठबंधन भी वादाखिलाफी के आरोप में लिपट कर दम तोड़ गया। बहरहाल, गठबंधन टूटने में नुक्सान किसका है और फायदा किसको, ये तो वक्त बताएगा लेकिन ये तय है कि चुनाव से ऐन पहले सियासी पार्टियों में रिश्ते तोड़ने और जोड़ने के खेल को पब्लिक चटकारे लेकर देख रही है।
No comments:
Post a Comment